सोमवार, 23 मार्च 2009

A For Andra Pradesh

- Andhra means "leader in battle" and Pradesh means "region" or "state".

- Andhra Pradesh is the fourth largest state in India by area and fifth largest by population.

- The majot rivers are Krishna and Godavari.

- It is also considered the Rice bowl of India.

- It was under Mauryan Empire.

- Major crop is Tobacco.

- Specialises in Virginia Tobacco.

- Andhra Pradesh is the home of many religious pilgrim centres. Tirupati, the abode of Lord Venkateswara, has the richest and most visited Hindu temple in India.note :

if ppl have some other fantastic facts, just leave a comment. I'll surely update the post.

To Be continued with new State...............
A For ASSAM
- in 1963 Nagaland was carved out of it
- Jan 21st 1972 Meghalaya was carved out of it.
- Mizoram was also a part of Asaam earlier.
- Mizoram was a Union Territory untill Jan 21st 1972.
- In 1987 Mizoram was declared a state.
- Highest rain fall 178-305 cm.
- Biggest river Brahmaputra.
- Tourist Place : Kaziranga National Park.
- 15.6% of world's and 50% of India's Tea production.
- First state where Oil was struck.
- It was struck at Digboi
- Assam also produces natural gas.
- Assam is the second place in the world (after Titusville in the United States) where petroleum was discovered.
- Asia’s first successful mechanically drilled oil well was drilled in Makum (Assam) way back in 1867
- World's Largest producer of Golden colored "Muga" silk.
To Be continued with new State...............
हैरान हूँ मैं.......

आज मैं ये जानकर बहुत ही हैरान हूँ कि आज हमारा देश, जंहा ५५ प्रतिशत से भी अधिक युवा निवास करते है, और जो हमारे देश के कर्णधार माने जाते है, उसी देश का युवा वर्ग अभी अपने देश से भली भाति परिचित नही है यदि यही स्थिति बनी रही तो इन्हे देश का कर्णधार कहना बेमानी सा होगा
इन स्थितियों से परिचित होने के बाद और देश का नागरिक होने के नाते मैं रोहिताश्वा मिश्रा अपने ब्लॉग के माध्यम से देश के युवा वर्ग को देश के बारे में जानकारी देने का बीड़ा उठाता हूँ, इस अभियान में मैं प्रतिदिन देश के एक राज्य के बारे में जानकारी देने का प्रयास करूँगा आशा है मेरे इस काम में मुझे समय-समय पर आप सभी का सहयोग और मार्गदर्शन मिलता रहेगा

आवश्यक सूचना..........

प्रिय पाठको ,

रोहिताश्व का नमस्कार.....

मैं आज से अपने ब्लॉग को हिंगलिश( हिन्दी+अंग्रेजी) के ब्लॉग में परिवर्तित कर रहा हूँ जैसा कि आज-कल इस भाषा का चलन दिन प्रतिदिन बढता ही जा रहा है अत इसी परिवर्तन को स्वीकार करते हुए मैं रोहिताश्वा कृष्ण मिश्रा अपने ब्लॉग को एक नए कलेवर में प्रस्तुत करने जा जा रहा हूँ आशा करता हूँ कि मुझे पहले कि ही तरह इस काम में भी आपका सदा सहयोग मिलता रहेगा

धन्यवाद !

आपके परिवार का सदस्य............

मंगलवार, 17 मार्च 2009

पूज्य बापू ,
नमस्कार।
आशा है, आप आज भी अपने विश्वास पर अडिग होंगे। ठीक उसी तरह, जैसे चौरा-चौरी में हुई हिंसा के बाद असहयोग आंदोलन वापस लेने के पक्ष में थे और बहुमत से सुभाष चंद्र बोस के अध्यक्ष चुने जाने के बाद भी आपकी असहमति उनसे कायम थी। सिर्फ अपने विचारों पर अडिग रहने के कारण ही आपने ब्रिटेन सरकार से भगत सिंह को फांसी पर न चढ़ाये जाने की गुजारिश नहीं की थी। आप अपने विचारों पर अंत तक अडिग रहे। सिर्फ इसलिए, क्योंकि आप मानते थे कि अनैतिक तरीके से आदमी एक बार तो जीत सकता है, लेकिन उसके बाद उसका आत्मबल खत्म हो जाता है और लंबी लड़ाई में वह न सिर्फ आपको कमज़ोर करता है, बल्कि सीधे-साधे उन आदमियों का भरोसा भी खो देता है, जो आपके विचारों को अपना संबल मानते हैं।
लेकिन बापू आप गलत थे!
आप जिंदगी भर मद्यनिषेध के पक्ष में आंदोलन चलाते रहे। ज़‍िंदगी भर जुआ के विरोध में रहे। जिंदगी भर कॉरपोरेट कल्चर की जगह लघु और कुटीर उद्योगों को बढ़ावा देने की वकालत करते रहे। जिंदगी भर अपनी लड़ाई सामने से लड़ते रहे। लेकिन नतीजा क्या हुआ?
एक गोली आयी तो सामने से, लेकिन क्या वह सामने आकर मारी गयी आपको? आपके विचारों से असहमति जता कर मारी गयी आपको गोली? नहीं न! बस कह दिया गया कि आप अप्रासंगिक हैं और मार दी गयी गोली।
छोड़‍िए उन बातों को। वह तो बहुत पुरानी बात है बापू। आजकल की बात करते हैं। इधर क्या हुआ, देखा आपने?
आपके विचारों का वही चश्मा नीलामी पर चढ़ गया। दांव पर लग गया। अब अगर आपके विचारों पर कायम रहते हुए सरकार उसकी नीलामी का इंतज़ार करती रहती, और फिर जो उसे खरीदता - सरकारी तरीके से सरकार उससे डील करती, तो आप समझ रहे हैं न बापू... बस हो गया था!
इसलिए हमने तय किया कि अगर आपके समय के विचारों को बचाना है, तो दांव पर लगी आपकी घड़ी और चश्मा की बोली लगानी होगी। क्योंकि हमलोग ये महत्वपूर्ण बात जान गये हैं कि किसी समय का विचार उस समय की वस्तुओं में ही निहित है। अगर किसी दूसरे ने इसे खरीद लिया तो फिर वह इसका पेटेंट भी कराएगा न! तब तो हम यह भी नहीं कह पाएंगे बापू कि आपकी घड़ी और आपके चश्‍मे पर सिर्फ भारत का अधिकार है।
इसलिए हमने तय किया बापू कि चाहे जो भी हो, हम इस नीलामी में शामिल होंगे। लेकिन सामने से नहीं, मुखौटा लगा कर। यही वजह है कि आपके प्रपौत्र और प्रपौत्री तुषार और तारा गांधी ने एक जमाने के मशहूर क्रिकेटिया दिलीप दोषी पर दांव लगाया, तो शराब किंग विजय माल्या गुमनाम रह कर अपने प्रतिनिधि बेदी के चश्मे से हर समय उस नीलामी में मौजूद रहे और उसे देखते रहे। आपके प्रपौत्रों को इस नीलामी में हार माननी पड़ी। लेकिन उससे क्या फर्क पड़ता है, बापू! जीत तो हमारी ही हुई न! हारे भी तो कॉरपोरेटिया शराब किंग विजय माल्या से ही हारे न! यानी अपने से। अपनों से हारने का क्या गम। और एक आप थे, जो ज़‍िंदगी भर शराबबंदी के लिए आंदोलन चलाते रहे। अब बताइए भला, अगर माल्या जी को आपके आंदोलन की याद आ गयी होती और उन्होंने आपको अपना विरोधी मान लिया होता, तो...! तब तो जान लीजिए बापू, गयी थी ये चश्मा और घड़ी भी। ठीक वैसे ही, जैसे द्रविड़ के हाथ से रॉयल चैलेंजर की कप्तानी निकलने वाली है।
जरा इस पर भी गौर फरमाइए बापू। आप आजादी के बाद कांग्रेस के विघटन के पक्ष में थे। अगर ऐसा हो गया होता, तो क्या होता। तब अंबिका सोनी कहां से आतीं, जो इस बात का दावा ठोंकती कि विजय माल्या सरकार के प्रतिनिधि के तौर पर उस नीलामी में मौजूद थे। ये अलग बात है कि माल्या जी कह रहे हैं कि वह सरकार के प्रतिनिधि के तौर पर वहां मौजूद नहीं थे। हो सकता है कि ये उन दोनों के बीच की आपसी समझदारी का मामला हो कि वह बोलेंगी - माल्या जी सरकार के प्रतिनिधि थे और माल्या जी कहेंगे - नहीं। इस तरह श्रेय सरकार को भी मिल जाएगा और चुनाव जैसे महापर्व के मौके पर आदर्श आचार संहिता के मामले में भी आपका चश्मा और घड़ी नहीं फंसेगी। नहीं तो क्या पता, चुनाव आयोग कहीं ये कह दे कि चुनाव की घोषणा के बाद सरकार नीलामी में कैसे गयी। ठीक उसी तरह नीलामी में खरीदी चीज को उसके मूल मालिक को वापस किया जाए, जैसे चुनाव की घोषणा के बाद होने वाले विकास के काम को उल्टा पहिया घुमा कर मूल रूप में लौटाने का वह फरमान जारी करती रही है। लेकिन बापू तमाम बातों के बीच एक बात तो सच है कि आपके सत्य के सिद्धांत का कहीं न कहीं पालन नहीं हुआ। या तो माल्या जी झूठ बोल रहे हैं या सोनी जी। अब आप ही बताइए कि सच के सहारे क्या कोई भी आंदोलन सफल हो सकता है, जैसा कि आप हमेशा कहते रहे हैं। मुझे यकीन है अब आप भी झूठ के महत्व को समझ गये होंगे।
इतना ही नहीं, अभी भी आपके चश्मे और घड़ी के देश में वापस आने पर फच्चर फंसा हुआ है। कहीं ऐसा न हो कि सरकार उन वस्तुओं पर कर राहत न दे और मजबूरन माल्या जी को टीपू की तलवार की तरह इन्हें भी देश के बाहर ही विभिन्न देशों में बने अपने किसी आवास में रखना पड़े। वैसे भी बापू, साढ़े नौ करोड़ की नीलामी के बाद आपको नहीं लगता कि माल्या जी कहां से टैक्स चुकाने के लिए पैसा लाएंगे। ये कोई आइपीएल का टूर्नामेंट तो है नहीं कि इसके लिए उनको इस मंदी में भी कोई प्रायोजक मिल जाएगा।
हां बापू, देखिए न, कुछ लोग अभी भी भितरघात करने पर लगे हैं - जो अपने आप को गांधीवादी कहते हैं - कह रहे हैं कि नीलामी में दांव पर लगी बापू की घड़ी और चश्मा तो हम ले आये, लेकिन कहीं न कहीं उसे लाने में हमलोगों ने उनकी दृष्टि और उनका समयबोध छोड़ दिया। अब बताइए न बापू, इस युग में जहां वस्तुएं ही बहुमूल्य है, वहां समय बोध और दृष्टि जैसी अ-मूर्तन और अ-मूल्य चीज़ के पीछे आज भी वे पड़े हैं।
बापू अब तो मेरी गुजारिश आप से ही है - अपना प्रार्थना गीत, सबको सम्मति दे भगवान गाते हुए अवतरित हों और लोगों को वैसे ही समझाएं, जैसे मुन्ना भाई को समझाया.............

सोमवार, 16 मार्च 2009

भगवान् को भी यदि इस दुनिया में आना है तो उसे रोटी के रूप में आना होगा
कल सिटी ग्रुप के, ये कहने के बाद कि इस वर्ष के पहले दो महीनों में, उसे मुनाफ़ा हुआ है अमरीका ही नहीं पूरे विश्व की अर्थ मंडियों में खुशहाली देखने में आयी जो रेगिस्तान में वर्षा की एक बूंद से कम नहीं है, लेकिन ऐसी परिस्थितियों के जानकारों का कहना है १९२९ की महामंदी के बाद जबकि ज़्यादातर लोगों का ये मानना था कि अब कभी भी ऐसे दिन नहीं देखने पड़ेंगे पर ऐसा नहीं हुआ.इस समय अमरीका के हर बड़े शहर में जिन लोगों की नौकरियां चली गयीं है वो तम्बुओं में पनाह लिए हुएं हैं .हर शहर के फ़ूड बैंक खाली हो गये हैं. इस समय राष्ट्रपति ओबामा का सबसे बड़ा लक्ष्य है अमरीका में इंसानों के बीच एक नया समझौता हो, उसी से कठिनाईयों से बाहर आया जा सकता है, एक साथ मिलकर ही इस मंदी के दौर से हम निकल सकते हैं.ऐसे ही एक समाचार ने अमरीका के करोङों लोगो में तब एक नया उत्साह पैदा किया, जब टेलीविजन पर उन्होंने ये देखा कि डेनवर शहर में एक अच्छे खासे चलते रेस्तंरा ने ये एलान किया कि इस मुश्किल के समय में कोई भी आकर खा सकता हैड उनका मेनू वैसा ही रहेगा जैसा कि हैड हर डिश के दाम भी वही रहेंगे, जिनके पास देने को पैसे नहीं हैं वो खाने के बाद रेस्तंरा के काम में अपनी मदद दे सकते हैं, काम में हाथ बटा सकते हैं. जिनके पास पास हैं वो दे सकते है जो ज़्यादा देकर मदद करना चाहतें हैं वो भी कर सकते हैं लेकिन कोई भी यहां से भूखा नहीं जायेगा. और ये भी कहा गया कि उन्होंने ये कदम गांधी जी के एक वाक्य से प्रेरित होकर उठाया है, गांधी जी ने एक बार कहा था कि लोगों की मुसीबतों को देखते हुए भगवान् को भी यदि इस दुनिया में आना है तो उसे रोटी के रूप में आना होगा.

शुक्रवार, 6 मार्च 2009

देश में,गांधी मत आना ........
संसद में भी घुसना अब तो नहीं रहा आसान
लालकिले जाओगे तो हो जाएगा अपमान
ऊँची-ऊँची कुर्सी पर भी बैठे हैं बैईमान
नहीं रहा जैसा छोड़ा था तुमने हिंदुस्तान
राजघाट के माली भी मारेंगे तुमको ताना।
अब देश में गांधी, मत आना मत आना, मत आना।
होंठ पे सिगरेट, पेट में दारू हो तो आ जाओ
तन आवारा, मन बाज़ारू हो तो आ जाओ
आदर्शों को टाँग सको तो खूंटी पर टाँगो
लेकर हाथ कटोरा कर्जा गोरों से माँगो
टिकट अगर मिल जाए तो तुम भी चुनाव लड़ जाना।
अब देश में गांधी, मत आना मत आना, मत आना।
अगर दोस्ती करनी हो तो दाउद से करना
मंदिर- मस्जिद के झगड़े में कभी नहीं पड़ना
आरक्षण की, संरक्षण की नीति न अपनाना
चंदे के फंदे को अपने गले न लटकाना
कहीं माधुरी दीक्षित पर तुम भी न फ़िदा हो जाना।
अब देश में गांधी, मत आना, मत आना, मत आना।
.........आँसू
पीड़ा का अनुवाद हैं आँसू
एक मौन संवाद हैं आँसू

दर्द , दर्द बस दर्द ही नहीं
कभी-कभी आह्लाद हैं आँसू

जबसे प्रेम धरा पर आया
तब से ही आबाद हैं आँसू

अब तक दिल में हैं हलचल-सी
मुझको उनके याद हैं आँसू

कभी परिंदे कटे-परों के
और कभी सैयाद हैं आँसू

इनकी भाषा पढ़ना 'प्रकृति'
मुफ़लिस की फ़रियाद हैं आँसू!!!
माँ के चरणों में ......
सुप्रभात ,कैसे हें आप ?
रोजी रोटी की जुगत में ,
संबंधों का ठीकरा बार बार उठाकर जमीन पर रखना पड़ रहा है ,
ऐसे में मुलाक़ात और बात दोनों कम हो रही है ,
मगर इस बात का निरंतर एहसास है कि लौट के बार बार आपके पास ही आना है ,
क्यूंकि आपके पास ही हमारी थाती है और आपके पास ही हमारी ठौर
स्वीकार करें मेरा अभिवादन माँ को लिखी इस कविता से ,
जिसे मैं हर पल याद करता हूँ
आसमान में बादल नहीं
चाँद खिला है माँ
बादल बरसते हें चाँद नहीं
हम फिर छले गए इस आसमान से
पीछे की पहाडी / कब हरी होगी माँ
कब आयेंगे पश्चिम के मेघ
नाले चल रहे होंगे
बादल कहीं नजर नहीं आते
मिटटी !
तुम्हारे चेहरे की भांति /सुखी हुई
और आँखें टकटकी लगाये देखती हें
निष्ठुर आसमान की और
कभी सूरज/कभी चाँद
मुँह चिढाते हैं हम बौछारों के मौसम में
धुप से बचाव के छाते लगते हैं ..........
पत्रकार .......
लोकतंत्र का इक,
अभिन्न अंग है, पत्रकार।
नाम कलम से, काम कलम से,
है ,युग निर्माता पत्रकार।
हिंसा और आतंक मिटाने की,
चेष्ठा है पत्रकार।
घटनाओं का आंखों देखा,
लेख है, लिखता पत्रकार।
जन-जन तक ख़बरें पहुंचाकर,
दायित्व निभाता पत्रकार।
दिखता नही सुबह का सूरज,
फिर कलम पकड़ता पत्रकार।
अविलम्बित ये मानव ऐसा ,
बेबाक टिप्पणी पत्रकार।
ये भी एक विडम्बना है,
आतंकित है पत्रकार।
हो जाए चाहे जो कुछ भी,
पर निडर व्यक्ति है पत्रकार।
समय अनिश्चित,
कार्य अनिश्चित,
पर निश्चित है, पत्रकार।
एक सिपाही बंदूको,
से एक सिपाही कमलकार,
लोकतंत्र का पत्रकार,
ये लोकतंत्र का पत्रकार।